Monday, 17 September 2012

छोडकर सबकुछ


छोडकर सब-कुछ नया आगाज़ करते हैं
नहीं शिकवा-शिकायत हंसी मजाक करते हैं

सिर्फ गम ही तो नहीं दिये हमें ज़िंदगी ने 
बाढ़-तूफ़ान छोड़िये फसल की बात करते हैं

बहुत हो व्यस्त तुम सफर भी नहीं असां
हुई मुद्दत मिले तुमसे नेट पर बात करते हैं

हमारी भी नहीं सुनते तुम्हारी भी नहीं सुनते
छोड़कर इनको जहाँ नया आबाद करते हैं

जिस मकसद से खुदा ने दुनिया बनायी थी
चलो एक-बार मिलकर खुदा को याद करते हैं

नादिर वो कहकर हमें गए थे भूल जाने को
सपनों में कभी यादों मे मुलाक़ात करते हैं 

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