Thursday, 20 September 2012

दुआओं में सबके


दुआओं में सबके है आना जाना
क्या मेरा क्या तुम्हारा ठिकाना

सपनों में आना यादों में मिलना
बस छोटा-सा है, हमारा घराना

सस्ती है यहाँ जान हमारी-तुम्हारी
बाकी तो है मंहगाई का ज़माना

सब तो हैं हमसे खफा-खफा से
हम बनायें कहाँ अपना आशियाना

कलई खुल गई कारगुजारियों की
क्या है तुम्हारा अब नया बहाना

हमें सब पता है, साजिशें तुम्हारी
उसूल है हमारा सबसे निभाना

चिरागों को अब रोशन कर दो
रोशनी में ढूंढेंगे अपना ठिकाना

3 comments:

  1. वाह ||||||||
    बहुत सुन्दर रचना..
    :-)

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  2. बहुत खूब ॥

    कलाई खुल गई कारगुजारियों की.... कलाई की जगह कलई कर लें

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