Monday, 24 September 2012

माना की दिल से

माना की दिल से प्यार तेरा कम नहीं होता
दुनिया में मगर एक यही गम नहीं होता

दुनिया में एक शख्स ही तुमको है क्यों अज़ीज़
माँ-बाप का भी प्यार कुछ कम नहीं होता

निकलोगे खुद से बाहर तो दुनिया है खुशगवार
पानी कभी कुएं का आबे-जमजम नहीं होता

खुद ही निकलना है तुम्हें यादों के भँवर से
हिम्मत के सिवा इसका कोई मरहम नहीं होता

करना तो चाहता हूँ बहुत कुछ अपने लिए भी
बढ़कर खुशी से सबकी खुद का आलम नहीं होता

करते हैं तेरे जज़्बे को सलाम हम भी नादिर
कभी प्यार जिम्मेदारियों से अहम नहीं होता

(आबे-जमजम – मक्के का पवित्र पानी)
(आलम - संसार)

2 comments:

  1. बहुत खूब नादिर सर!

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    1. बहुत शुक्रिया तुहिन
      कुछ रचनाएं इस(adress below) पोस्ट पर भी है

      http://www.openbooksonline.com/profile/Nadir

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