Thursday, 13 September 2012

दीवार शख्त ही सही


दीवार शख्त ही सही गिरना तय है
वक्त मुश्किल ही सही बदलना तय है

हम रुके हैं कहाँ रोके से किसी के
फ़ूल है तो खुशबू का महकना तय है

हम तलाश ही लेंगे ज़मीं अपने लिए
हज़ार ठोकरों के बाद संभालना तय है

तुम न समझो किसी को अपने आगे
पर तूफान में जड़ों का हिलना तय है

जिंदगी का नादिर” हिसाब भी रखना 
इन साँसों का एक-दिन रुकना तय है

5 comments:

  1. बेहतरीन ग़ज़ल
    आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 19/09/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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    1. बहुत शुक्रिया यशोदा जी

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  2. नादिर सर,
    वक़्त किसके बंधे बंधा है,इस ज़िंदगी का वक़्त की रेत में फ़िसलना तय है!

    बहुत सारगर्भित छंद आप लिखते है। इस ब्लॉग के ज़रिये आपके इस असाधारण प्रतिभा का पता चला है । मल्हार में सिर्फ एक या दो कविताएँ ही आती है उससे आपके विचार प्रवाह को आसानी से समझना संभव नहीं है। यह ब्लॉग आपके समग्र विचार शैली का दर्पण है।

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  3. Replies
    1. बहुत शुक्रिया माथुर जी

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