Saturday, 15 September 2012

पथराई हुई आँखों में

पथराई हुई आँखों में ख़्वाब लिए फ़िरते हैं
अपने बच्चों के लिए आस लिए फ़िरते हैं


ये कमज़ोरी  ही  सही, हम  जज़्बाती हैं
रिश्तों  में  हम यही बात लिए फ़िरते हैं


नफ़रतों के बाज़ार में  अमन का पैगाम
अपने हाथों में यही काम लिए फिरते हैं


पा ही लेंगे हम अपनी मंज़िल का पता
अपने हाथों में  किताब लिए फ़िरते हैं

14 comments:

  1. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 27-09 -2012 को यहाँ भी है

    .... आज की नयी पुरानी हलचल में ....मिला हर बार तू हो कर किसी का .

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    1. बहुत शुक्रिया संगीता जी

      हम सोच भी रहे थे कि कुछ दिनों से आपकी नई पुरानी हलचल मे जगह नहीं मिल रही ।

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  2. ये कमज़ोरी ही सही, हम जज़्बाती हैं
    रिश्तों में हम यही बात लिए फ़िरते हैं


    नफ़रतों के बाज़ार में अमन का पैगाम
    अपने हाथों में यही काम लिए फिरते हैं

    बहुत बढ़िया

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    1. बहुत शुक्रिया वंदना जी

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  3. नफ़रतों के बाज़ार में अमन का पैगाम
    अपने हाथों में यही काम लिए फिरते हैं

    बहुत सुन्दर ...प्यारी बात कही है आपने नादिर जी

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    1. आभार सरस जी, बहुत धन्यवाद

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  4. bahut badhiya shodon ka samagam...dhnywad kabhi samay mile to mere blog http://pankajkrsah.blogspot.com pe padharen swagat hai

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    1. बहुत शुक्रिया पंकज जी
      इंशा-अल्लाह(ईश्वर ने चाहा तो) बहुत जल्द आपके ब्लॉग मे मिलेंगे।

      धन्यवाद

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  5. नफ़रतों के बाज़ार में अमन का पैगाम
    अपने हाथों में यही काम लिए फिरते हैं
    बहुत खूब ...क्या बात कही है

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  6. बहुत शुक्रिया शिखा जी
    आभार

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  7. वाह! बेहतरीन गज़ल...

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  8. शुक्रिया कैलाश जी।

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