Sunday, 16 September 2012

ज़रा-सी रोशनी देखी

ज़रा-सी रोशनी देखी पतिंगे चले आये
गरीबों  को लूटने  दरिंदे  चले  आये

मरने के  बाद मेरा  मुआवज़ा  लेने
दूर-दूर से नकारा-निकम्मे चले  आये

बहेलियों ने दरख्तों से दोस्ती कर ली
साजिशों से बेख़बर  परिंदे चले आये

नफ़रतें, बेईमानी, झूठ  और  फरेब
इंसानों  का  खून  पीने चले आये

लगा रहें हैं  एड़ी-चोटी के दाँव-पेंच
हम तो  ख़ुदा के सहारे चले आये 

2 comments:

  1. मुआवजा लेने के लिए तो सभी रिश्तेदार बन जाते हैं .... बहुत बढ़िया कटाक्ष करती हुई गज़ल

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  2. bahut shukriya sangeeta ji
    comments ate hai to lagta hai likhna sarthak ho gaya.

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