Monday, 17 September 2012

चीख़ों से बेचैन


अपनी चीख़ों से बेचैन सो न पाया था
तुम्हे इसीलिये मै जगाने आया था

बहुत बड़े थे तुम्हारी उम्मीदों के पहाड़
मै प्यार की पाठशाला में नया आया था

उम्र-भर भागा फिरा मै जिसके पीछे
वो कोई और नहीं मेरा ही साया था

वैसे तो दिल में मेरे हज़ार गम थे
मगर मै होंठ अपने सिल के लाया था

ताकती रहती है दरवाज़े पर बूढ़ी आँखें
मै उनका चैन-ओ-सुकूँ ले आया था

मुझे भी उस उम्र के पड़ाव में पहुँचना है
मै अपना मुस्तकबिल गाँव में छोड़ आया था

ये शहर मेरे मिज़ाज का नहीं नादिर
तुम्हें आखिरी सलाम करने आया था 

2 comments:

  1. उम्र-भर भागा फिरा मै जिसके पीछे
    वो कोई और नहीं मेरा ही साया था!!
    वाह! नादिर सर दिल को छु लिया आपने! हम अपने ही साये के पीछे भाग रहे हैं ये समझकर की वो हमारी कायनात है जैसे रेगिस्तान का यात्री मरीचिका के पीछे भागता है। जियो मेरे लाल!!

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  2. बहुत शुक्रिया
    आप जैसे पाठकों की जरूरत हर रचनाकार को होती है
    बड़ी गहराई से समझा आपने और विचार व्यक्त किए
    हिन्दी में पकड़ भी आपकी अच्छी है ।
    अपनी रचनाएं भी share किया करो।

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