Friday, 12 October 2012

बातों को हक की

बातों को हक की भूलाने लगे हैं
किस्से-कहानियों से डराने लगे हैं

अजब है रिवाज़ इस शहर का
दुआ-सलाम से घबराने लगे हैं

हम तो आए थे  हाल पूछने
नज़रें हमीं से चुराने लगे हैं

कभी उंगली पकड़ चले थे हमारी 
वो आँखेँ हमें ही दिखाने लगे हैं

नकारा  समझते  रहे जो हमें
आज दाँतों से उंगली दबाने लगे हैं

इंसानों की फ़ितरत समझें तो कैसे
लोग मगरमच्छ के आँसू बहाने लगे हैं

4 comments:

  1. चहरे पर चहरे लिए
    घूमते है लोग...कैसे पहचाने मुश्किल है...
    सुन्दर रचना...

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    1. बहुत शुक्रिया रीना जी
      ब्लॉग में आने और रचना पसंद करने के लिए आभार।

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  2. बहुत खुबसूरत गज़ल...
    कभी उंगली पकड़ चले थे हमारी
    वो आँखेँ हमें ही दिखाने लगे हैं
    वाह !!
    लाजवाब शेर..
    अनु

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया अनु जी (ब्लॉग मे visit करते रहें)

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