Sunday, 21 October 2012

शेरों को हमने

शेरों को हमने ठिकाने दिये हैं
गीदड़ हमें अब डराने लगे हैं

हाथों में जिनके रहनुमाई दी थी
बस्तियाँ हमारी जलाने लगे हैं

धर्म का मतलब जिन्हे मालूम नहीं
क़ाज़ी उन्हें सब बनाने लगे हैं

लूट-खसोट, धोखा जिनका ईमान
तहज़ीब हमको सिखाने लगे हैं

आए तो थे ख़बर लेने हमारी
हौंसला देख लड़खड़ाने लगे हैं

4 comments:

  1. हाथों में जिनके रहनुमाई दी थी
    बस्तियाँ हमारी जलाने लगे हैं

    Khoob Kaha...

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  2. बहुत खूबसूरत गज़ल.... यथार्थ को कहती हुई

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    1. धन्यवाद संगीता जी
      आगे भी स्नेह बनाये रखें।

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