Tuesday, 13 November 2012

तेरा था कुछ

तेरा था कुछ और न मेरा था
दुनिया का बाज़ार लगा था


मेरे घर में आग लगी जब

तेरा घर भी साथ जला था


अपना हो या हो वो पराया

सबके दिल में चोर छिपा था


तुम भी सोचो मै भी सोचूँ

क्यों अपनों में शोर मचा था


टोपी - पगड़ी बाँट रहे थे

खूँ का सब में दाग लगा था


मै भी तेरे पास नहीं था

तू भी मुझसे दूर खड़ा था

6 comments:

  1. मिलकर रहने में ही भलाई है दूरियां हमें अकेला कर देती है..बेहतरीन रचना....
    आपको सहपरिवार दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ...
    :-)

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    1. बहुत शुक्रिया रीना जी । आपको एवं परिवार को दीपावली की शुभकामनायें ।

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    1. बहुत शुक्रिया संगीता जी,दीपावली की शुभकामनायें ।

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  3. वाह! लाज़वाब और सटीक अभिव्यक्ति..

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  4. आपका बहुत शुक्रिया कैलाश जी ।

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