Monday, 5 November 2012

रूठ मै जाऊँ


रूठ मै जाऊँ तो मनाना मुझको
जो गिरता हूँ तो उठाना मुझको

मैंने मोहब्बत ही तो सबसे की है
गर हो खता खुदा बचाना मुझको

तुम्हारी हरेक शर्त मंजूर है मुझे
हाथ पकड़ के कभी बिठाना मुझको

बड़ी ही नाज़ुक है यादें हमारी
दीवारों पर यूँ न सजाना मुझको

दिल के कमज़ोर होते हैं इश्क वाले
बुरी नज़र से सबकी बचाना मुझको

साथ माँ-बाप का किसे अच्छा नहीं लगता 
मेरी मजबूरीयों से ए-रब बचाना मुझको

सोना चाँदी ओ जागीरें क्या करना 
सोहबत में फकीरों के बिठाना मुझको

वो शिफत जो अपनों से दूर कर दे
ख्वाहिशों से ऐसी बचाना मुझको 

10 comments:

  1. सोना चाँदी ओ जागीरें क्या करना
    सोहबत में फकीरों के बिठाना मुझको

    खूबसूरत ख़्वाहिश ...उम्दा गज़ल

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  2. हौसला अफजाई के लिए धन्यवाद संगीता जी
    आभार...

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  3. साथ माँ-बाप का किसे अच्छा नहीं लगता
    मेरी मजबूरीयों से ए-रब बचाना मुझको

    सोना चाँदी ओ जागीरें क्या करना
    सोहबत में फकीरों के बिठाना मुझको
    आमीन !!

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    1. धन्यवाद, बहुत आभार

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  4. उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।


    मेरा बेटा
    नादिर ख़ान
    http://www.openbooksonline.com/
    होली में झटपट मले, चेहरे पे मुस्कान |
    लाल हरे के भेद से, बच्चा है अनजान |
    बच्चा है अनजान, दिवाली दीप बटोरे |
    क्रिसमस ईद मनाय, खिलौने से भर झोले |
    रहता खुद में मस्त, सजाता रहे रंगोली |
    बच्चा बच्चा रहे, मनाये यूँ ही होली ||

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    1. आदरणीय रविकर जी बहुत आभार, आपने अपने ब्लॉग में स्थान दिया ।

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  5. बड़ी ही नाज़ुक है यादें हमारी
    दीवारों पर यूँ न सजाना मुझको

    ...वाह! बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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    1. बहुत शुक्रिया आदरणीय कैलाश जी अपना स्नेह बनाये रखें ।

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