Wednesday, 12 December 2012

सब तो यहाँ हैं अजनबी


हाँ प्यार से इकरार है
पर शिर्क से इंकार है

अब दिल में वो जज़्बा नहीं
बस प्यार का बाज़ार है

 मेरा ठिकाना क्या भला
जब बिक चुका घर-बार है

 आँखों में हैं सपने जवाँ
एक बीच में दीवार है

 ये शाम तो अब ढल चुकी
बाकी मगर ख़ुमार है

है काम आती कोशिशें
यूँ हारना बेकार है

 दिल में वफ़ादारी नहीं
क्यों प्यार का इज़हार है

 अब नींद भी आती नहीं
जब जिंदगी बेज़ार है

 वादा किया तुमने नहीं
तेरा मगर इंतज़ार है

 थी प्यार में ताकत बहुत
क्यों प्यार अब लाचार है

 लेता नहीं है सुध कोई
पूरा भरा परिवार है

 चाहो परखना गर हमें
हम तो सदा तैयार हैं

 पल में बदल जाए कथन
कैसा तेरा किरदार है

 सब तो यहाँ हैं अजनबी
किससे कहें के प्यार है

17 comments:

  1. लेता नहीं है सुध कोई
    पूरा भरा परिवार है

    चाहो परखना गर हमें
    हम तो सदा तैयार हैं
    वाह ... बहुत खूब

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  2. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 15/12/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  3. हौसला अफजाई के लिए बहुत शुक्रिया........

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  4. शुक्रिया यशोदा जी
    बहुत आभार ........

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  5. http://urvija.parikalpnaa.com/2012/12/blog-post_9748.html

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  6. बहुत शुक्रिया अनु जी एवं रश्मि जी
    आभार........

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  7. प्यार बस व्यापार है......

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    1. ब्लॉग में आने और कोमेंट्स के लिए शुक्रिया अरुण जी ..

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  8. इस बाज़ार में भावनाओं की ख़रीद फ़रोख़्त सरे आम होती है।

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  9. बहुत खूब .... सच्चाई बयान करती गज़ल

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  10. wah bahut khoob likha apne...aaj ki duniya ka sach

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  11. पल में बदल जाए कथन
    कैसा तेरा किरदार है

    सब तो यहाँ हैं अजनबी
    किससे कहें के प्यार है
    waah... aapko pahli bar "nayi-purani halchal" ke madhyam se padha hai... padhkar dil garden-garden ho gya.

    you are welcome to my recent poem: नम मौसम, भीगी जमीं ..

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  12. वाह....
    बेहतरीन रचना....

    अनु

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  13. बहुत सुन्दर

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    1. शुक्रिया ओंकार जी......

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