Sunday, 10 February 2013

यूँ लड़ते हुये हम कहाँ तक गिरेंगे


ज़हर भर चुका है दिलों में हमारे
सभी सो रहे है खुदा के भरोसे

जुबां बंद फिर भी अजब शोर-गुल है
हैं जाने कहाँ गुम अमन के नज़ारे

धरम बेचते हैं धरम के पुजारी
हमें लूटते हैं ये रक्षक हमारे

भला कब हुआ है कभी दुश्मनी से
बचा ही नहीं कुछ लुटाते-लुटाते

बटा घर है बारी तो शमशान की अब
यूँ लड़ते हुये हम कहाँ तक गिरेंगे

धरम का था मतलब खुदा से मिलाना
खुदा को ही बांटा धरम क्या निभाते

6 comments:

  1. धरम का था मतलब खुदा से मिलाना
    खुदा को ही बांटा धरम क्या निभाते

    बहुत सुंदर गज़ल

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  2. बहुत शुक्रिया संगीता जी...

    आभार ...


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  3. बटा घर है बारी तो शमशान की अब
    यूँ लड़ते हुये हम कहाँ तक गिरेंगे ..

    बिलकुल सच लिखा है ... इंसान शायद इसी तरफ जा रहा है .. जानते हुवे भी की साथ कुछ भी नहीं चलेगा ...
    शुक्रिया आपकी टिप्पणियों का ...

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  4. बहुत सुन्दर ग़ज़ल भाई नादिर जी ब्लॉग पर आने हेतु दिल से शुक्रिया |

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  5. बहुत खूब भाई नादिर जी |आभार

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