Monday, 18 March 2013

बस तेरी चुप्पी मुझे खलने लगी



जब से मजबूरी मेरी बढ़ने लगी
दोस्तों से दूरी भी बनने लगी

उनकी हाँ में हाँ मिलाया जब नहीं 
बस मेरी मौजूदगी डसने लगी

कद मेरा उस वक्त से बढ़ने लगा
आजमाइस दुनिया जब करने लगी

भा गई फिर सब्र की तौफीक भी 
ज़ुल्म की शिद्दत भी जब बढ़ने लगी

दूर मुझसे आप जब से हो गए
ज़िंदगी से हर खुशी झड़ने लगी

तेरी हर तकलीफ से वाकिफ़ हूँ मै
बस तेरी चुप्पी मुझे खलने लगी 

8 comments:

  1. तेरी हर तकलीफ से वाकिफ़ हूँ मै
    बस तेरी चुप्पी मुझे खलने लगी
    वाह ... बहुत खूब

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    1. बहुत शुक्रिया आपने कोशिश को सराहा ।

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  3. दूर मुझसे आप जब से हो गए
    ज़िंदगी से हर खुशी झड़ने लगी ..

    किसी के न होने के एहसास को बाखूबी गढा है ... लाजवाब शेर है इस गज़ल का ...

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  4. आदरणीय रविकर जी एवं दिगंबर जी
    बहुत शुक्रिया, हमारी कोशिश को अपने सराहा।
    आभार....

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  5. Replies
    1. आदरणीय निहार रंजन जी एवं मन्टू जी ब्लॉग मे आने और रचना को पसंद किया बहुत शुक्रिया ।
      आभार....

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