Sunday, 6 October 2013

हद से गुज़रे हैं हम निभाने में

वज़्न  2222 1212  22
आने में उनके और जाने में |
युग बीता देखने दिखाने में  ||

अब उन्हे कोसने से क्या हासिल 
गुज़री है उम्र तो मनाने में  ||

ये विज्ञापन का दौर है प्यारे  
बिकता है झूठ अब ज़माने में  ||

तेरी इक-इक अदा के क्या कहने  
खुद को हम हैं, लगे लुटाने में  ||

घाटा हो या कि फायदा नादिर 
हद से गुज़रे हैं हम निभाने में  ||

3 comments:

  1. ये विज्ञापन का दौर है प्यारे
    बिकता है झूठ अब ज़माने में ..

    बहुत खूब ... लाजवाब शेर है इस गज़ल का ... सचाई बयाँ करता ...

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  2. बेख़ौफ़ और बेधडक ..लिखते रहे
    क्या बचा है अब ज़माने में

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  3. आदरणीय दिगंबर जी बबन पांडे जी हौसला देने के लिए बहुत शुक्रिया ।

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