Sunday, 24 November 2013

हर दफ़ा ख़ुद पर ही निशाना लगता है

वज़्न -  2122  2212   2222

तुम हो तो हर मौसम सुहाना लगता है
हर तरफ जन्नत सा नज़ारा लगता है 

जैसे चाहो आवाज़ दो अपने रब को
प्यार में तो हर नाम अपना लगता है

साथ रहते चलते कई सदियाँ गुज़रीं
क्यों नदी का फिर दो किनारा लगता है

अब दवा असर करती नहीं कोई हम पर 
मर्ज़ जाने कितना पुराना लगता है

अपनी ही परछाई से मै डर जाता हूँ
बाद तेरे सब - कुछ पराया लगता है

 ढूंढनी है अब खामियाँ अपनी नादिर

हर दफ़ा ख़ुद पर ही निशाना लगता है

3 comments:

  1. बढ़िया है आदरणीय-
    आभार -

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  2. कमाल की रवानगी लिए ... लाजवाब गज़ल ...

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  3. आदरणीय रविकर जी एवं आदरणीय दिगंबर जी हौसला अफजाई के लिए बहुत शुक्रिया ।

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