Saturday, 30 November 2013

दुखड़ा अपना किसको सुनाऊँ

वज़्न - 222  221  122 

दुखड़ा अपना किसको सुनाऊँ
का पहनूँ मै, और का खाऊँ

जब दामों में आग लगी हो
क्या सौदा बाज़ार से लाऊँ

मंहगाई अब मार रही है
कैसे इससे पिंड छुड़ाऊँ

खुद अपना ही बोझ बना मै
कैसे घर का बोझ उठाऊँ

विद्यालय की फीस बहुत है
अब बच्चों को कैसे पढ़ाऊँ

पैसों से हैं, बनते बिगड़ते
रिश्ते ऐसे क्यों मै निभाऊँ

हैं झूठी तारीफ के भूखे
अब इनको मै क्या समझाऊँ 

5 comments:

  1. समसामयिक रचना..बढ़ती मॅहगाई,बोलते पैसे,टूटते रिश्ते..
    बेहतरीन...:-)

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    1. शुक्रिया रीना जी ...आभार

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  2. अनुसरण करने की कोशिश कर रहा हूँ ब्लाग का पर एरर आ रही है 403

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