Friday, 20 December 2013

अपनों को आपस में लड़ा देता है पैसा


वज्न  2212  2212  2212   2

दीवार नफरत की उठा देता है पैसा
कमज़ोर रिश्तों को बना देता है पैसा

उल्टा चलन कैसा सिखा देता है पैसा
ईमान आबिद का गिरा देता है पैसा

अंगूरी सा पहले नशा देता है पैसा
बीमार फिर खुद का, बना देता है पैसा

आता है मंजूरे नज़र, बनकर यही और
अपनों को आपस में लड़ा देता है पैसा

बैठे हैं महफिल में सभी बनकर जो अपने
दरबार झूठों का सजा देता है पैसा

सपने दिखाता है नये सबको सुहाने
फिर नींद रातों की उड़ा  देता है पैसा

नकली दिखावा तो कहीं झूठी शबासी 
मंज़र कैसे-कैसे दिखा देता है पैसा

हारी हुयी बाज़ी भी नादिर ये पलट दे
शिकवे-गिले पल में मिटा देता है पैसा

2 comments:

  1. लाजवाब गज़ल ...
    पैसे का निराला खेल ...

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  2. शुक्रिया आदरणीय दिगंबर जी ।

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