Saturday, 30 March 2013

होली (हाईकु)


हंसी ठिठोली
सबको मुबार‍क 
रंगों की होली ।

 बढ़ता मेल 
कोई गोरा न काला 
समझो न खेल ।

सावन बीता
तुम न आये प्रिये 
फागुन आया ।

होली का जोश
मन हुआ मयूर 
खोना न होश ।

होली का रंग
एक से मिले एक 
राजा न रंक ।

भीगी चुनर 
गोरी खड़ी लजाये 
झुकी नज़र ।

बुरा न मानो
होली की हुड़दंग 
अपना जानो ।

रंगों से सजे 
मस्ती में सराबोर
बच्चे क्या बूढ़े ।
 

Monday, 11 March 2013

फासला


मेरे आने और तुम्हारे जाने के बीच
बस चंद कदमों का फासला रहा
न मै जल्दी आया कभी
न कभी तुमने इंतज़ार किया
ये फासला ही तो था
जिसे हमने
संजीदगी और ईमानदारी के साथ निभाया
फासले को
सिमटने नहीं दिया
और न ही
मिटने दिया
हम जुड़े रहे
फासले के साथ
बावजूद
तमाम मुश्किलों और तकलीफ़ों के
वो जिंदा रहा हमारे बीच
फासला बनकर  
और हम
मरते रहे, मरते रहे, मरते रहे
अपनेअपने अहम के साथ ...

Saturday, 23 February 2013

वजह


रेगिस्तान में
रेत की चादर की तरह
मेरी ज़िंदगी भटकती रही
कभी यहाँ, कभी वहाँ
मैं ढूँढता रहा अपना ठिकाना
हवा बहा ले गई
जब चाहा जिधर चाहा
मेरा अपना ठिकाना
कुछ भी नहीं
मगर मालूम है मुझे
हर चीज़ का
अपना वज़ूद होता है
फिर चाहे नागफनी हो,
या हो नीम !
कोहिनूर हो,
या हो रेत !
बिना वजह
कुछ भी नहीं होता
गरीब न होते
अमीर को कौन पहचानता ?
प्यास न होती
पानी का महत्व कौन जानता ?
प्यार न होता
दिल की धड़कनें कौन सुनता ?
तुम न होते
प्यार क्या है, मैं कैसे जानता ?
बिना वजह
कुछ भी नहीं होता
कुछ होता है
क्योंकि
वजह होती है ।

Monday, 28 January 2013

पिता


 मैं जब भी डर जाता
आपके पास चला आता
आप समझ जाते
मुझे दुलारने लगते
निडर लोगों के किस्से बताते

जब भी मुझे
चीज़ें चाहिये होतीं
मैं आपके काम करने लगता
आप भाँप जाते
और कोशिश करते
ख़्वाहिश पूरी करने की

जब मुझसे गलती हो जाती
मैं रोने लगता
आप समझ जाते
विषय बदलकर
गलती से सबक लेने की
नसीहत देते

आज पिता बनने के बाद
अपने बच्चों  के लिए
चाहकर भी
आप जैसा नहीं बन सका  
बनता भी तो कैसे
आपसे बराबरी
कोई कर ही नहीं सकता
इस बात की ख़ुशी है मुझे
पर मैं
आपके काम नहीं आया
जैसा आप आये
इस बात का
अफ़सोस है मुझे ।

Saturday, 5 January 2013

विकास बनाम इंसानियत – दर


रोज़ होती रही चर्चायें
बैठकों पे बैठकें
कार्यालयों से लेकर चौपालों तक
कारखानों से लेकर शेयर बाज़ारों तक
हर जगह
कोशिशें जारी हैं 
कैसे बढ़े
कितना बढ़े
कहाँ-कहाँ कितनी गुंजाईशें है
सभी लगे हैं
देश विकसित हो या विकासशील
या कि हो अविकसित
चिंतायें सबकी एक है
कैसे बढ़े विकास-दर
कैसे बढ़े व्यापार
बाज़ार भाव
कैसे बढ़े निर्यात 
फिर चाहे 
मौत का सामान ही क्यों न हो
व्यापार बढ़ना चाहिए
विकास-दर बढ़ती रहनी चाहिए 
और इंसानियत की दर 
घटते - घटते
इतनी घट गई
कि अब
अव्वल तो चर्चा नहीं होती
और जब होती है
तो किसी के पास
वक्त ही नहीं होता 

Sunday, 16 December 2012

आओ वालमार्ट

आओ वालमार्ट 
स्वागत है आपका
अपनी कमज़ोर हो चुकी
अर्थव्यवस्था को
मज़बूत करने
आओ
हमारी मज़बूत होती
अर्थव्यवस्था को
कमज़ोर करने
आओ

हमने आपके हथियार नहीं लिए
इस नुक्सान की भरपायी के लिए
नयी संभावनाओं को तलाशने
आओ
किसानों के पसीने निचोड़ने
गरीब जनता का ख़ून चूसने
आओ वालमार्ट

यूनियन कार्बाइड की याद
धुंधली पड़ चुकी है
तुम नयी यादें देने आओ
हमारे अनाजों को
हमारी मेहनत को
अपनी शर्तों में
छीनने आओ
अपने चालाक पैतरों से
भोली-भाली जनता को
ठगने आओ
आओ वालमार्ट
अपने पैसे की ताकत दिखाओ

Friday, 30 November 2012

मंज़िल अभी दूर है


तैयार किए गए
कुछ रोबोट
डाले गए
नफरत के प्रोग्राम
चार्ज किए गए
हैवानियत की बैटरी से
फिर भेज दिये  गए 
इंसानों की बस्ती में
फैलने आतंक

ये और बात है
इंसानियत ज़िंदा रही
हार गए हैवान
नहीं डरा सके हमें
न हीं कमज़ोर कर सके
हमारा आत्मविश्वास

और फिर
नष्ट कर दिया गया
आखिरी रोबोट भी
हम खुश ज़रूर हैं
पर जब तक जिंदा हैं
रोबोट बनाने वाले हाथ
इंसानियत के दुश्मन आज़ाद हैं
और हमारी मंज़िल
अभी दूर है