किताबों में बहुत कुछ होता है, और भी बहुत कुछ हो सकता है। किताबों को सम्मान दें, अच्छी बातें लिखें प्यार और भाईचारा लिखें, किताबें नहीं चाहती उनके अंदर नफरतें लिखीं जाएँ । ................... "नादिर अहमद ख़ान"
Saturday, 11 November 2017
क्यूँ है तू बीमार मेरे दिल
क्यूँ है तू बीमार मेरे दिल
गम से यूँ मत हार मेरे दिल
तय है इक दिन मौत का आना
इस सच को स्वीकार मेरे दिल
पहले ही से दर्द बहुत हैं
और न ले अब भार मेरे दिल
सुनकर भाषण होश न खोना
ये सब है व्यापार मेरे दिल
कौन यहाँ पर कब बिक जाए
रहना तू हुशियार मेरे दिल
झूठ खड़ा है सीना ताने
सच तो है लाचार मेरे दिल
दिल के कोने में रहने दे
प्यार का हक मत मार मेरे दिल
होगी उसकी भी मजबूरी
पी ले गुस्सा यार मेरे दिल
रिश्तों को तू खूब निभाना
सबसे मिल इक बार मेरे दिल
सच्चाई के साथ चलेंगे
हो जा तू तैयार मेरे दिल
Monday, 28 March 2016
तरही गज़ल
मुद्दतों बाद मुझे दिल से पुकारा उसने
धीरे धीरे ही सही खुद में उतारा उसने
मुझको हर मोड़ पे हर रोज़ सँवारा उसने
ख़ाक था मै तो, किया मुझको सितारा उसने
बुझ रही आग को इस दिल में जलाने के लिए
दर्द का घूँट मेरे दिल में उतारा उसने
वो तो हर हाल में हालात से लड़ सकता था
जाने क्या बात हुयी, खुद को ही हारा उसने
ये न मालूम था, वो इतना बादल जाएगा
बस पलटते ही मेरी पीठ पे मारा उसने
दफ्न कर बैठे थे जिस आग को बरसों पहले
फिर से सुलगा दी मुझे करके इशारा उसने
आग तो आग है इन्सां को जला देती है
बदले की आग में, बस खुद को ही मारा उसने
खेल में दाँव तो उसके थे, हर इक बार मगर
बारहा मुझको अखाड़े में उतारा उसने
उसकी आवाज़ पे लब्बैक कहा है हरदम
आज़माने के लिए जब भी पुकारा उसने
ज़ख्म ही ज़ख्म दिये हमने ज़मीं को लेकिन
अपनी बाहों का दिया सबको सहारा उसने
उसकी बातों का असर ऐसा हुआ है जैसे
मेरे अन्दर कोई सैलाब उतारा उसने
पुछल्ला
फिर जगाने के लिए सोयी हुयी गैरत को
इक नया दर्द मेरे दिल में उतारा उसने
Thursday, 18 February 2016
पिता
वो छुपाते रहे अपना दर्द
अपनी परेशानियाँ
यहाँ तक कि
अपनी बीमारी भी….
वो सोखते रहे परिवार का दर्द
कभी रिसने नहीं दिया
वो सुनते रहे हमारी शिकायतें
अपनी सफाई दिये बिना ….
वो समेटते रहे
बिखरे हुये पन्ने
हम सबकी ज़िंदगी के …..
हम सब बढ़ते रहे
उनका एहसान माने बिना
उन पर एहसान जताते हुये
वो चुपचाप जीते रहे
क्योंकि वो पेड़ थे
फलदार
छायादार ।
Monday, 1 February 2016
दर्द इतना कहाँ से उठता है।
दर्द इतना कहाँ से उठता है।
ये समझ लो की जाँ से उठता है।
ये समझ लो की जाँ से उठता है।
सबसे आँखें चुरा रहा था मै
गम मगर अब जुबां से उठता है।
गम मगर अब जुबां से उठता है।
वो असर एक दिन दिखायेगा
शब्द जो भी जुबां से उठता है।
शब्द जो भी जुबां से उठता है।
दिल गुनाहों से भर गया सबका
अब भरोसा जहाँ से उठता है।
अब भरोसा जहाँ से उठता है।
आग लालच की खा गयी सबको
अब धुआँ हर मकाँ से उठता है।
अब धुआँ हर मकाँ से उठता है।
याद किरदार फिर वही आया
जो मेरी दास्तां से उठता है।
जो मेरी दास्तां से उठता है।
फिर कोई वस्वसा नहीं होता
न्याय जब नकदखाँ से उठता है।
न्याय जब नकदखाँ से उठता है।
मसअले प्यार से हुये थे
हल
वो हुनर अब जहाँ से उठता
है।
आग दिल की तो बुझ गई नादिर
बस धुआँ ही यहाँ से उठता है।
बस धुआँ ही यहाँ से उठता है।
मै अगर टूट भी जाऊँ तो संभल जाऊँगा
|
नाम अल्लाह का लेकर मै निकल जाऊँगा
मै जो हालात का मारा हूँ, संभल जाऊँगा |
दूर मंज़िल है बहुत राह में दुश्वारी भी
हाथ में हाथ दे वरना मै फिसल जाऊँगा |
बात झूठी हैं तेरी और हैं झूठी कसमें
क्यूँ समझता है कि बातों से बहल जाऊँगा |
दोष मुझमें हैं बहुत, प्यार मगर सच्चा है
साथ तेरा जो मिलेगा तो बदल जाऊँगा |
रूठ जाना जो बहाना है फ़क़त इक पल का
तुम अगर प्यार से देखोगी पिघल जाऊँगा |
तेरी बातें तेरी ख़ुशबू हैं अभी तक मुझमें
मै अगर टूट भी जाऊँ तो संभल जाऊँगा ।
|
|
|
Thursday, 12 March 2015
खुद्दारियाँ नहीं चलतीं
(तरही गज़ल) दिलों के खेल में खुद्दारियाँ नहीं चलतीं
अजब चलन है के अब यारियाँ नहीं चलतीं
नफा न हो तो, वफादारियाँ नहीं चलतीं
नफा न हो तो, वफादारियाँ नहीं चलतीं
नये ज़माने की अय्यारियाँ नहीं
चलतीं
हसद की बुग्ज़ की, बीमारियाँ नहीं चलतीं
हसद की बुग्ज़ की, बीमारियाँ नहीं चलतीं
बिला वजह की तरफदारियाँ नहीं
चलतीं
अमल अगर न हो, तैय्यारियाँ नहीं चलतीं
अमल अगर न हो, तैय्यारियाँ नहीं चलतीं
निकल पड़े हैं सफर में ये हौसला लेकर
कि हौंसला हो तो, दुश्वारियाँ नहीं चलतीं
कि हौंसला हो तो, दुश्वारियाँ नहीं चलतीं
मज़ा कुछ और है दिल प्यार में
लुटाने का
दिलों के खेल में खुद्दारियाँ नहीं चलतीं
दिलों के खेल में खुद्दारियाँ नहीं चलतीं
तुम्हें तलाश है जिसकी ख़ुदा अता
कर दे
किसी का छीन के सरदारियाँ नहीं चलतीं
किसी का छीन के सरदारियाँ नहीं चलतीं
जो असलियत है, नज़र सबको आती है साहब
ये मुफ़लिसी की अदाकारियाँ नहीं चलतीं।
ये मुफ़लिसी की अदाकारियाँ नहीं चलतीं।
Tuesday, 3 February 2015
तरही गज़ल : न जाने कब हो सहर कौन इंतिज़ार करे ।
तुझे ये हक़ है सितम मुझपे
तू हज़ार करे
मगर वकार को मेरे न तार –तार करे
तेरी ही फ़िक्र में गुज़री
है सुब्हो-शाम मेरी
कभी तो मुझको भी अपनों में तू शुमार करे
मै तेरे साथ हूँ जब तक
तुझे ज़रूरत है
तुझे ये कैसे बताऊँ कि एतबार करे
तू मेरे साथ रहा और दो
कदम न चला
अजीब फिर भी भरम है कि मुझसे प्यार करे
भुला चुका हूँ, नहीं है जुबां पे नाम तेरा
ये बात और है, दिल अब भी इंतिज़ार करे
सफर कठिन है बहुत और दूर
है मंज़िल
न जाने कब हो सहर कौन इंतज़ार करे
Friday, 27 June 2014
तरही गज़ल
दिल का हाल कैसा है चिट्ठियाँ समझती हैं
तुम भी लौट आओगे हिचकियाँ समझती हैं
कुछ तो कम नसीबी है और कुछ नादानी है
हम जुदा हुये कैसे गलतियाँ समझती हैं
घर किया था हमने तो आपके हवाले ही
किसने घर जलाया है बस्तियां समझती हैं
बस दुआ ही लिखती है और कुछ नहीं कहती
माँ का हाल कैसा है चिट्ठियाँ समझती हैं
यूँ तो सब बराबर हैं बेटी हो या बेटे हों
किसको कितनी आज़ादी बेटियाँ समझती है
हम नहीं बिखर सकते इन हवा के झोंकों से
उंगलियों की ताकत को मुट्ठियाँ समझती हैं
हम भी हैं यहाँ तन्हा, तुम भी हो वहाँ तन्हा
अपनी अपनी मजबूरी दूरियाँ समझती हैं
तुम हमें नहीं कहते अपने दिल की बातों को
आँख में नमी है जो पुतलियाँ समझती हैं
सब नकाब ओढ़ें हैं अपनी अपनी फ़ितरत पर
फूल कौन तोड़ेगा डालियाँ समझती हैं
Thursday, 20 March 2014
छन्न पकैया छन्न पकैया, खेले हैं सब होली
छन्न पकैया छन्न पकैया, खेले हैं सब होली
मस्ती में है झूमे कैसे, मस्तानों की टोली
छन्न पकैया छन्न पकैया, होवै खूब बधाई
धूम धड़ाका करते हैं सब, कहते होली आई
छन्न पकैया छन्न पकैया, खेल रहे सब होली
झूम उठे हैं नर नारी अब, करते हँसी ठिठोली
मस्ती में है झूमे कैसे, मस्तानों की टोली
छन्न पकैया छन्न पकैया, होवै खूब बधाई
धूम धड़ाका करते हैं सब, कहते होली आई
छन्न पकैया छन्न पकैया, खेल रहे सब होली
झूम उठे हैं नर नारी अब, करते हँसी ठिठोली
छन्न पकैया छन्न पकैया, मौसम बड़ा सुहाना
खूब बजाते ढ़ोल मजीरा, खूब सुनाते गाना
छन्न पकैया छन्न पकैया, दिल से गले लगाते
होली का संदेश सुनाकर, सबको ही हर्षाते
छन्न पकैया छन्न पकैया, देखो फागुन आया
तरह तरह की बनी मिठाई, सब का मन ललचाया
Wednesday, 19 March 2014
फाग आया आओ हम होली मनायें
वज़्न 2122 2122 2122
फाग आया आओ हम होली मनायें
नफ़रतों को होलिका में अब जलायें //1
होलिका से अम्न का दीपक जलाकर
झूठी चालों, साजिशों को भी मिटायें //2
अब जगा दें, सो चुकी इंसानियत को
दुनिया को रंगीन हम सबकी बनायें //3
पाठ सबको भाई चारे का पढ़ाकर
देश के सम्मान को ऊँचा उठायें //4
प्यार का पिचकारियों में रंग भरकर
फूल अब इंसानियत के हम खिलायें //5
ऊँचा नीचा है न कोई, गोरा काला
विश्व को हम एकता का सुर सुनायें //6
मन के सच्चे है सभी बच्चे हमारे
संग इनके नाचें गायें खिलखिलायें //7
Friday, 14 March 2014
क्षणिकाएँ
(एक)
तुम अक्सर कहते रहे
मत लिया करो
मेरी बातों को दिल पर
मज़ाक तो मज़ाक होता है
ये बातें जहाँ शुरू
वहीं ख़त्म ....
और एक दिन
मेरा छोटा सा मज़ाक
तार –तार कर गया
हमारे बरसों पुराने रिश्ते को
न जाने कैसे.........
(दो)
घर की मालकिन ने
घर की नौकरानी को
सख्त लहजे में चेताया
आज महिला दिवस है
घर पर महिलाओं का प्रोग्राम है
कुछ गेस्ट भी आयेंगे
खबरदार !
जो कमरे से बाहर आई
टांगें तोड़ दूँगी........
रोती है,जब बेटी तो, फटता है कलेजा
जन्म पर बेटों के तो, बजता है नगाड़ा
बेटियों के नाम पर, आता है पसीना
हर बहू तो होती है, बेटी भी किसी की
रोती है,जब बेटी तो, फटता है कलेजा
नौकरानी हो कोई, या कोई सेठानी
हर किसी का लाल तो, होता है नगीना
खुद बनाता है महल, औरों के लिए जो
वो खुले मैदान पर, करता है गुज़ारा
खेतिहर का धान, सड़ जाता है खुले में
पेट की फिर आग में, जलता है बेचारा
Sunday, 2 March 2014
हालात .....
नियम/अनुशासन
सब आम लोगों के लिए है
जो खास हैं
इन सब से परे हैं
उन पर लागू नहीं होते
ये सब
ख़ास लोग तो तय करते हैं
कब /कौन/ कितना बोलेगा
कौन सा मोहरा
कब / कितने घर चलेगा
यहाँ शह भी वे ही देते हैं
और मात भी
आम लोग मनोरंजन करते हैं
आम लोगों का रेमोट
ख़ास लोगों के हाथों में होता है
वे नचाते हैं
आम लोग नाचते हैं.....
मगर हालात
हमेशा एक जैसे नहीं होते
और न ही बदलने में वक़्त लगता
बस !! एक हल्का सा झटका
और खिसकने लगती है
पैरों के नीचे से ज़मीन
फिर जैसे मुट्ठी से रेत
जितना ज़ोर लगाओ
उतनी ही तेजी से फिसलते हैं हालात .....
Subscribe to:
Posts (Atom)






