Friday, 14 March 2014

क्षणिकाएँ

(एक)
तुम अक्सर कहते रहे
मत लिया करो
मेरी बातों को दिल पर
मज़ाक तो मज़ाक होता है
ये बातें जहाँ शुरू
वहीं ख़त्म ....
और एक दिन
मेरा छोटा सा मज़ाक
तार –तार कर गया
हमारे बरसों पुराने रिश्ते को
न जाने कैसे.........

   
 (दो)
घर की मालकिन ने
घर की नौकरानी को
सख्त लहजे में चेताया
आज महिला दिवस है
घर पर महिलाओं का प्रोग्राम है
कुछ गेस्ट भी आयेंगे
खबरदार !
जो कमरे से बाहर आई
टांगें तोड़ दूँगी........

रोती है,जब बेटी तो, फटता है कलेजा

जन्म पर बेटों के तोबजता है नगाड़ा
बेटियों के नाम परआता है पसीना 

हर बहू तो होती है, बेटी भी किसी की
रोती है,जब बेटी तो, फटता है कलेजा

नौकरानी हो कोई, या कोई सेठानी
हर किसी का लाल तो, होता है नगीना

खुद बनाता है महल, औरों के लिए जो 
वो खुले मैदान पर, करता है गुज़ारा

खेतिहर का धान, सड़ जाता है खुले में
पेट की फिर आग में, जलता है बेचारा

Sunday, 2 March 2014

हालात .....


नियम/अनुशासन
सब आम लोगों के लिए है
जो खास हैं
इन सब से परे हैं
उन पर लागू  नहीं होते
ये सब
ख़ास लोग तो तय करते हैं
कब /कौन/ कितना बोलेगा
कौन सा मोहरा
कब / कितने घर चलेगा
यहाँ शह भी वे ही देते हैं  
और मात भी
आम लोग मनोरंजन करते हैं   
आम लोगों का रेमोट
ख़ास लोगों के हाथों में होता है  
वे नचाते हैं
आम लोग नाचते हैं.....
मगर हालात
हमेशा एक जैसे नहीं होते
और न ही बदलने में वक़्त लगता
बस !! एक हल्का सा झटका
और खिसकने लगती है
पैरों के नीचे से ज़मीन
फिर जैसे मुट्ठी से रेत
जितना ज़ोर लगाओ
उतनी ही तेजी से फिसलते हैं हालात ..... 

Tuesday, 28 January 2014

माँ-बाप

         

 (एक)

सपने लेते रहे आकार
महानगर की इमारतों की तरह
बड़े और बड़े / भव्य और विशाल
सपने बढ़ते रहे
आगे.. से आगे
हमारी ज़रूरतें
पैर फैलाने लगीं

           (दो)

माँबाप की ज़रूरतें
होती गईं छोटी.. और छोटी 
गाँव के अधटूटे मकान में 
महज़ दो वक्त की रोटी तक सिमट गईं


          (तीन)

वे कभी नहीं आए
हमारे सपनों के बीच
मगर जुड़े रहे हमसे
अपनी दुआओं के साथ


Wednesday, 8 January 2014

गज़लें

२१२ २१२ २१२ २१२
फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन

      गज़ल (एक)

ज़िंदगी से मेरी, उनका जाना हुआ
अपनी मजबूरियों का बहाना हुआ

राह जब से हमारी जुदा हो गई
बीच अपनों के रहकर बेगाना हुआ

बढ़ गयी हैं मेरी अब परेशानियाँ
जब से गैरों के घर आना जाना हुआ

है कठिन दौर ये, ऐ खुदा सब्र दे
नेकियों का चलन अब पुराना हुआ

जाने अल्लाह को क्या है मंज़ूर अब
फिर तुम्हारी गली मेरा जाना हुआ

याद में क्यों पुरानी भटकता है दिल
उनसे बिछड़े हुये तो जमाना हुआ

गज़ल (दो)

आपका घर मेरे, आना जाना हुआ
रौनकें बढ़ गईं दिल दीवाना हुआ

लौट कर आ गई है मेरी हर ख़ुशी
जिस घड़ी आपका लौट आना हुआ

मिल गई है मुझे इक नई राह अब
जब से गैरों के घर आना जाना हुआ

आदमी अपनी हद पार करता है जब
उसका गर्दिश में ही फिर ठिकाना हुआ

ढूँढना नेकियाँ जिनकी फ़ितरत में है
उनका हँसना हँसाना खजाना हुआ

दुश्मनों से मुझे कुछ शिकायत नहीं
अब तो मै दोस्तों का निशाना हुआ

(यह गज़ल तरही मिसरा - "जब से गैरों के घर आना जाना हुआ" पर आधारित है ।)

Tuesday, 31 December 2013

एक दिन बेटा नाम करेगा

पिता ने जब  सुना
शहर की पढ़ाई के बारे में
रख दिया गिरवी
पुश्तैनी खेत
और भेज दिया
शहर के बड़े हॉस्टल
अपने बेटे को
  
जब पढ़ानी थी, इंजीनियरिंग
पिता ने बेच दिया 
गाँव का पुश्तैनी मकान  

फिर जब
नौकरी नहीं मिली
और खड़ा करना चाहा
बेटे ने खुद का व्यवसाय
पिता ने बेच डाला
बचा-खुचा भी
ये सोच कर
एक दिन बेटा नाम करेगा ।

व्यवसाय चल पड़ा तो शादी भी कर दी
बड़ा नाम है, इंजीनियर साहब का
शहर के बड़े ठेकेदार भी हैं
पिता के साथ-साथ 
रोशन कर रहे हैं
गाँव का नाम भी
अरे!! बड़े फरमाबरदार  हैं
इंजीनियर साहब
अपने व्यस्त शिड्यूल से 
हर माह 
वक्त निकाल लेते हैं
वृद्ध आश्रम में
माँ-बाप से मिलने
सपरिवार ज़रूर जाते हैं।

Thursday, 18 April 2013

किसका दोष है ??














रोज़ होती सड़क दुर्घटनायें

कभी ये, कभी वो

शिकार होते लोग

सब जानते हैं

समझते हैं

आज कोई

तो कल

हम भी हो सकते हैं शिकार

दुर्घटना तो आखिर दुर्घटना है



चलो मान लिया

गलती इसकी थी, या उसकी

जाँच का विषय है

पर घण्टों सड़क पर
तड़पती ज़िंदगी

मदद के लिए विनती करती

कभी इशारे से बुलाती

भीड़ से आस की उम्मीद लिए

हर बार आखिरी कोशिश करती  

लाश में तब्दील होती ज़िंदगी



किसका दोष है ??

इंसानों का  ?

या इंसानों के भेष में घूम रही

मशीनों का ....