Monday, 28 March 2016

तरही गज़ल

मुद्दतों बाद मुझे दिल से पुकारा उसने
धीरे धीरे ही सही खुद में उतारा उसने 

मुझको हर मोड़ पे हर रोज़ सँवारा उसने
ख़ाक था मै तो, किया मुझको सितारा उसने 

बुझ रही आग को इस दिल में जलाने के लिए
दर्द का घूँट मेरे दिल में उतारा उसने

वो तो हर  हाल में हालात से लड़ सकता था
जाने क्या बात हुयी, खुद को ही हारा उसने 

ये न मालूम था, वो इतना बादल जाएगा
बस पलटते ही मेरी पीठ पे मारा उसने

दफ्न कर बैठे थे जिस आग को बरसों पहले
फिर से सुलगा दी मुझे करके इशारा उसने

आग तो आग है इन्सां को जला देती है
बदले की आग में, बस खुद को ही मारा उसने

खेल में दाँव तो उसके थे, हर इक बार मगर
बारहा मुझको अखाड़े में उतारा उसने

उसकी आवाज़ पे लब्बैक कहा है हरदम
आज़माने के लिए जब भी पुकारा उसने

ज़ख्म ही ज़ख्म दिये हमने ज़मीं को लेकिन
अपनी बाहों का दिया सबको सहारा उसने

उसकी बातों का असर ऐसा हुआ है जैसे
मेरे अन्दर कोई सैलाब उतारा उसने

पुछल्ला

फिर जगाने के लिए सोयी हुयी गैरत को
इक नया दर्द मेरे दिल में उतारा उसने

Thursday, 18 February 2016

पिता


वो छुपाते रहे अपना दर्द
अपनी परेशानियाँ
यहाँ तक कि
अपनी बीमारी भी….

वो सोखते रहे परिवार का दर्द
कभी रिसने नहीं दिया
वो सुनते रहे हमारी शिकायतें
अपनी सफाई दिये बिना ….

वो समेटते रहे
बिखरे हुये पन्ने
हम सबकी ज़िंदगी के …..

हम सब बढ़ते रहे
उनका एहसान माने बिना
उन पर एहसान जताते हुये
वो चुपचाप जीते रहे
क्योंकि वो पेड़ थे
फलदार
छायादार ।

Monday, 1 February 2016

दर्द इतना कहाँ से उठता है।

दर्द इतना कहाँ से उठता है।
ये समझ लो की जाँ से उठता है।

सबसे आँखें चुरा रहा था मै
गम मगर अब जुबां से उठता है।

वो असर एक दिन दिखायेगा
शब्द जो भी जुबां से उठता है।

दिल गुनाहों से भर गया सबका
अब भरोसा जहाँ से उठता है।

आग लालच की खा गयी सबको
अब धुआँ हर मकाँ से उठता है।

याद किरदार फिर वही आया 
जो मेरी दास्तां से उठता है।

फिर कोई वस्वसा नहीं होता
न्याय जब नकदखाँ से उठता है।

मसअले प्यार से हुये थे हल
वो हुनर अब जहाँ से उठता है।


आग दिल की तो बुझ गई नादिर
बस धुआँ ही यहाँ से उठता है।

मै अगर टूट भी जाऊँ तो संभल जाऊँगा

नाम अल्लाह का लेकर मै निकल जाऊँगा 
मै जो हालात का मारा हूँसंभल जाऊँगा |


दूर मंज़िल है बहुत राह में दुश्वारी भी
हाथ में हाथ दे वरना मै फिसल जाऊँगा |


बात झूठी हैं तेरी और हैं झूठी कसमें
क्‍यूँ समझता है कि बातों से बहल जाऊँगा |


दोष मुझमें हैं बहुत, प्यार मगर सच्चा है
साथ तेरा जो मिलेगा तो बदल जाऊँगा |


रूठ जाना जो बहाना है फ़क़त इक पल का
तुम अगर प्यार से देखोगी पिघल जाऊँगा |


तेरी बातें तेरी ख़ुशबू हैं अभी तक मुझमें
मै अगर टूट भी जाऊँ तो संभल जाऊँगा ।






Thursday, 12 March 2015

(तरही गज़ल) दिलों के खेल में खुद्दारियाँ नहीं चलतीं

अजब चलन है के अब यारियाँ नहीं चलतीं
नफा न हो तो, वफादारियाँ नहीं चलतीं

नये ज़माने की अय्यारियाँ नहीं चलतीं
हसद की बुग्ज़ की, बीमारियाँ नहीं चलतीं

बिला वजह की तरफदारियाँ नहीं चलतीं
अमल अगर न हो, तैय्यारियाँ नहीं चलतीं

निकल पड़े हैं सफर में ये हौसला लेकर 
कि हौंसला हो तो, दुश्वारियाँ नहीं चलतीं

मज़ा कुछ और है दिल प्यार में लुटाने का 
दिलों के खेल में खुद्दारियाँ नहीं चलतीं

तुम्हें तलाश है जिसकी ख़ुदा अता कर दे 
किसी का छीन के सरदारियाँ नहीं चलतीं


जो असलियत है, नज़र सबको आती है साहब 
ये मुफ़लिसी की अदाकारियाँ नहीं चलतीं।

Tuesday, 3 February 2015

तरही गज़ल : न जाने कब हो सहर कौन इंतिज़ार करे ।

तुझे ये हक़ है सितम मुझपे तू हज़ार करे
मगर वकार को मेरे न तार तार करे 


तेरी ही फ़िक्र में गुज़री है सुब्हो-शाम मेरी 

कभी तो मुझको भी अपनों में तू शुमार करे 


मै तेरे साथ हूँ जब तक तुझे ज़रूरत है

तुझे ये कैसे बताऊँ कि एतबार करे 


तू मेरे साथ रहा और दो कदम न चला

अजीब फिर भी भरम है कि मुझसे प्यार करे 


भुला चुका हूँ, नहीं है जुबां पे नाम तेरा

ये बात और है, दिल अब भी इंतिज़ार करे 


सफर कठिन है बहुत और दूर है मंज़िल

न जाने कब हो सहर कौन इंतज़ार करे

Friday, 27 June 2014

तरही गज़ल

दिल का हाल कैसा है चिट्ठियाँ समझती हैं
तुम भी लौट आओगे हिचकियाँ समझती हैं

कुछ तो कम नसीबी है और कुछ नादानी है    
हम जुदा हुये कैसे गलतियाँ समझती हैं

घर किया था हमने तो आपके हवाले ही
किसने घर जलाया है बस्तियां समझती हैं

बस दुआ ही लिखती है और कुछ नहीं कहती
माँ का हाल कैसा है चिट्ठियाँ समझती हैं

यूँ तो सब बराबर हैं बेटी हो या बेटे हों
किसको कितनी आज़ादी बेटियाँ समझती है

हम नहीं बिखर सकते इन हवा के झोंकों से
उंगलियों की ताकत को मुट्ठियाँ समझती हैं

हम भी हैं यहाँ तन्हा, तुम भी हो वहाँ तन्हा
अपनी अपनी मजबूरी दूरियाँ समझती हैं

तुम हमें नहीं कहते अपने दिल की बातों को
आँख में नमी है जो पुतलियाँ समझती हैं

सब नकाब ओढ़ें हैं अपनी अपनी फ़ितरत पर  

फूल कौन तोड़ेगा डालियाँ समझती हैं