Tuesday, 31 December 2013

एक दिन बेटा नाम करेगा

पिता ने जब  सुना
शहर की पढ़ाई के बारे में
रख दिया गिरवी
पुश्तैनी खेत
और भेज दिया
शहर के बड़े हॉस्टल
अपने बेटे को
  
जब पढ़ानी थी, इंजीनियरिंग
पिता ने बेच दिया 
गाँव का पुश्तैनी मकान  

फिर जब
नौकरी नहीं मिली
और खड़ा करना चाहा
बेटे ने खुद का व्यवसाय
पिता ने बेच डाला
बचा-खुचा भी
ये सोच कर
एक दिन बेटा नाम करेगा ।

व्यवसाय चल पड़ा तो शादी भी कर दी
बड़ा नाम है, इंजीनियर साहब का
शहर के बड़े ठेकेदार भी हैं
पिता के साथ-साथ 
रोशन कर रहे हैं
गाँव का नाम भी
अरे!! बड़े फरमाबरदार  हैं
इंजीनियर साहब
अपने व्यस्त शिड्यूल से 
हर माह 
वक्त निकाल लेते हैं
वृद्ध आश्रम में
माँ-बाप से मिलने
सपरिवार ज़रूर जाते हैं।

Friday, 20 December 2013

अपनों को आपस में लड़ा देता है पैसा


वज्न  2212  2212  2212   2

दीवार नफरत की उठा देता है पैसा
कमज़ोर रिश्तों को बना देता है पैसा

उल्टा चलन कैसा सिखा देता है पैसा
ईमान आबिद का गिरा देता है पैसा

अंगूरी सा पहले नशा देता है पैसा
बीमार फिर खुद का, बना देता है पैसा

आता है मंजूरे नज़र, बनकर यही और
अपनों को आपस में लड़ा देता है पैसा

बैठे हैं महफिल में सभी बनकर जो अपने
दरबार झूठों का सजा देता है पैसा

सपने दिखाता है नये सबको सुहाने
फिर नींद रातों की उड़ा  देता है पैसा

नकली दिखावा तो कहीं झूठी शबासी 
मंज़र कैसे-कैसे दिखा देता है पैसा

हारी हुयी बाज़ी भी नादिर ये पलट दे
शिकवे-गिले पल में मिटा देता है पैसा

Saturday, 30 November 2013

दुखड़ा अपना किसको सुनाऊँ

वज़्न - 222  221  122 

दुखड़ा अपना किसको सुनाऊँ
का पहनूँ मै, और का खाऊँ

जब दामों में आग लगी हो
क्या सौदा बाज़ार से लाऊँ

मंहगाई अब मार रही है
कैसे इससे पिंड छुड़ाऊँ

खुद अपना ही बोझ बना मै
कैसे घर का बोझ उठाऊँ

विद्यालय की फीस बहुत है
अब बच्चों को कैसे पढ़ाऊँ

पैसों से हैं, बनते बिगड़ते
रिश्ते ऐसे क्यों मै निभाऊँ

हैं झूठी तारीफ के भूखे
अब इनको मै क्या समझाऊँ 

Sunday, 24 November 2013

हर दफ़ा ख़ुद पर ही निशाना लगता है

वज़्न -  2122  2212   2222

तुम हो तो हर मौसम सुहाना लगता है
हर तरफ जन्नत सा नज़ारा लगता है 

जैसे चाहो आवाज़ दो अपने रब को
प्यार में तो हर नाम अपना लगता है

साथ रहते चलते कई सदियाँ गुज़रीं
क्यों नदी का फिर दो किनारा लगता है

अब दवा असर करती नहीं कोई हम पर 
मर्ज़ जाने कितना पुराना लगता है

अपनी ही परछाई से मै डर जाता हूँ
बाद तेरे सब - कुछ पराया लगता है

 ढूंढनी है अब खामियाँ अपनी नादिर

हर दफ़ा ख़ुद पर ही निशाना लगता है

Sunday, 6 October 2013

हद से गुज़रे हैं हम निभाने में

वज़्न  2222 1212  22
आने में उनके और जाने में |
युग बीता देखने दिखाने में  ||

अब उन्हे कोसने से क्या हासिल 
गुज़री है उम्र तो मनाने में  ||

ये विज्ञापन का दौर है प्यारे  
बिकता है झूठ अब ज़माने में  ||

तेरी इक-इक अदा के क्या कहने  
खुद को हम हैं, लगे लुटाने में  ||

घाटा हो या कि फायदा नादिर 
हद से गुज़रे हैं हम निभाने में  ||

Saturday, 24 August 2013

फिर चुनावी दौर शायद आ रहा है


फिर चुनावी दौर शायद आ रहा है
द्वेष का बाज़ार फिर गरमा रहा है

मेंमने की खाल में है भेड़िया जो
बोटियों को नोंच सबकी खा रहा है

इस तरह से सच भी दफ़नाया गया अब 
झूठ को सौ बार वो दुहरा रहा है

क्या वफ़ादारी निभायी जा रही है
देवता, शैतान को बतला रहा है

बोझ दिल में सब लिए अपने खड़े हैं

ख़ुद-से ही हर शख़्स अब शरमा रहा है 

Thursday, 9 May 2013

सर्द हालात सही बर्फ पिघल जाएगी


रात के साथ मुलाक़ात निकल जाएगी
जिंदगी रेत की मानिंद फिसल जाएगी

आप जो आज मेहरबान हुये है हम पर
चाल हालात सुधरते ही बदल जाएगी

भोली आवाम है, वो चाँद पे क्या जाएगी
झूठे वादों के दिखावे में बहल जाएगी

मखमली ख्वाब है, ये प्यार तुम्हारा मेरा
इन्हीं यादों में मेरी शाम भी ढल जाएगी

मै ख़ुदा ज़ात से मायूस नहीं हूँ तेरी
सर्द हालात सही बर्फ पिघल जाएगी 

Thursday, 18 April 2013

किसका दोष है ??














रोज़ होती सड़क दुर्घटनायें

कभी ये, कभी वो

शिकार होते लोग

सब जानते हैं

समझते हैं

आज कोई

तो कल

हम भी हो सकते हैं शिकार

दुर्घटना तो आखिर दुर्घटना है



चलो मान लिया

गलती इसकी थी, या उसकी

जाँच का विषय है

पर घण्टों सड़क पर
तड़पती ज़िंदगी

मदद के लिए विनती करती

कभी इशारे से बुलाती

भीड़ से आस की उम्मीद लिए

हर बार आखिरी कोशिश करती  

लाश में तब्दील होती ज़िंदगी



किसका दोष है ??

इंसानों का  ?

या इंसानों के भेष में घूम रही

मशीनों का ....

Saturday, 30 March 2013

होली (हाईकु)


हंसी ठिठोली
सबको मुबार‍क 
रंगों की होली ।

 बढ़ता मेल 
कोई गोरा न काला 
समझो न खेल ।

सावन बीता
तुम न आये प्रिये 
फागुन आया ।

होली का जोश
मन हुआ मयूर 
खोना न होश ।

होली का रंग
एक से मिले एक 
राजा न रंक ।

भीगी चुनर 
गोरी खड़ी लजाये 
झुकी नज़र ।

बुरा न मानो
होली की हुड़दंग 
अपना जानो ।

रंगों से सजे 
मस्ती में सराबोर
बच्चे क्या बूढ़े ।