Monday, 28 January 2013

पिता


 मैं जब भी डर जाता
आपके पास चला आता
आप समझ जाते
मुझे दुलारने लगते
निडर लोगों के किस्से बताते

जब भी मुझे
चीज़ें चाहिये होतीं
मैं आपके काम करने लगता
आप भाँप जाते
और कोशिश करते
ख़्वाहिश पूरी करने की

जब मुझसे गलती हो जाती
मैं रोने लगता
आप समझ जाते
विषय बदलकर
गलती से सबक लेने की
नसीहत देते

आज पिता बनने के बाद
अपने बच्चों  के लिए
चाहकर भी
आप जैसा नहीं बन सका  
बनता भी तो कैसे
आपसे बराबरी
कोई कर ही नहीं सकता
इस बात की ख़ुशी है मुझे
पर मैं
आपके काम नहीं आया
जैसा आप आये
इस बात का
अफ़सोस है मुझे ।

Thursday, 10 January 2013

दामिनी तुम जिंदा हो



दामिनी तुम जिंदा हो
हर औरत का हौंसला बनकर
न्याय की आवाज़ बनकर
वक्त की ज़रूरत बनकर
आस्था की पुकार बनकर
एकता की मिसाल बनकर
तुम लाखों दिलों में जिंदा हो
न्याय की उम्मीद बनकर
तुम जीवित हो दामिनी
हम सब के अंदर विश्वास बनकर

दामिनी
हमें तुम पर नाज़ है 
व्यर्थ नहीं जाएगा
तुम्हारा बलिदान
यह इंसाफ़ की आवाज़ बनकर
सड़कों से सत्ता की गलियारों तक
फुटपाथ से लेकर महलों तक
दब चुकी
या दबा दी गई
जुबाँ का खोलेगा राज़
हर दामिनी के आँसुओं की कीमत 
दर्द का इलाज़
खून के एक एक बूँद का हिसाब
और अधिकारों का मागेगा जवाब

तुमने जो सहा दामिनी 
उसे पूरे  देश ने महसूस किया
अब ये दायित्व है हमारा 
तुम्हें इंसाफ़ मिले
तुम जैसी हर दामिनी को इंसाफ़ मिले
और सबक मिले
ऐसे लोगों को
जो कभी
सत्ता के नशे में
कभी शराब के नशे में
तो कभी
ताकत के ज़ोर पर  
अपनी मर्दानगी का रौब दिखाते हैं
उन्हें सबक मिलकर रहेगा

दामिनी बादल छंटने को हैं
नई सुबह आने को है
वो आकर रहेगी
हमारा संकल्प पक्का है 
वह डगमगाएगा नहीं
झुकेगा नहीं
हारेगा नहीं

दामिनी
तुम हमारी हिम्मत बनकर
अन्याय को ललकारती रहोगी
हम सबके बीच
अपने होने का एहसास कराओगी
तुमने हम सबको
पूरे देश को जोड़ दिया है
एक कर दिया है
अब लोग
छोटा-बड़ा, गरीब-अमीर
ऊँच-नीच, जाति धर्म भूलकर
एक हो चुके हैं
तुमने बता दिया                      
हमारी ज़रूरतें एक हैं
हमारा दर्द एक है
हमारे विचार एक है
हमारी आवाज़ें एक है
हमारा जज़्बा एक है
आँसुओं का सबब एक है
हमें इंसाफ़ भी एक ही चाहिए 
सिर्फ ओ सिर्फ एक
सजा ए मौत..

Saturday, 5 January 2013

विकास बनाम इंसानियत – दर


रोज़ होती रही चर्चायें
बैठकों पे बैठकें
कार्यालयों से लेकर चौपालों तक
कारखानों से लेकर शेयर बाज़ारों तक
हर जगह
कोशिशें जारी हैं 
कैसे बढ़े
कितना बढ़े
कहाँ-कहाँ कितनी गुंजाईशें है
सभी लगे हैं
देश विकसित हो या विकासशील
या कि हो अविकसित
चिंतायें सबकी एक है
कैसे बढ़े विकास-दर
कैसे बढ़े व्यापार
बाज़ार भाव
कैसे बढ़े निर्यात 
फिर चाहे 
मौत का सामान ही क्यों न हो
व्यापार बढ़ना चाहिए
विकास-दर बढ़ती रहनी चाहिए 
और इंसानियत की दर 
घटते - घटते
इतनी घट गई
कि अब
अव्वल तो चर्चा नहीं होती
और जब होती है
तो किसी के पास
वक्त ही नहीं होता