Thursday, 12 March 2015

(तरही गज़ल) दिलों के खेल में खुद्दारियाँ नहीं चलतीं

अजब चलन है के अब यारियाँ नहीं चलतीं
नफा न हो तो, वफादारियाँ नहीं चलतीं

नये ज़माने की अय्यारियाँ नहीं चलतीं
हसद की बुग्ज़ की, बीमारियाँ नहीं चलतीं

बिला वजह की तरफदारियाँ नहीं चलतीं
अमल अगर न हो, तैय्यारियाँ नहीं चलतीं

निकल पड़े हैं सफर में ये हौसला लेकर 
कि हौंसला हो तो, दुश्वारियाँ नहीं चलतीं

मज़ा कुछ और है दिल प्यार में लुटाने का 
दिलों के खेल में खुद्दारियाँ नहीं चलतीं

तुम्हें तलाश है जिसकी ख़ुदा अता कर दे 
किसी का छीन के सरदारियाँ नहीं चलतीं


जो असलियत है, नज़र सबको आती है साहब 
ये मुफ़लिसी की अदाकारियाँ नहीं चलतीं।

Tuesday, 3 February 2015

तरही गज़ल : न जाने कब हो सहर कौन इंतिज़ार करे ।

तुझे ये हक़ है सितम मुझपे तू हज़ार करे
मगर वकार को मेरे न तार तार करे 


तेरी ही फ़िक्र में गुज़री है सुब्हो-शाम मेरी 

कभी तो मुझको भी अपनों में तू शुमार करे 


मै तेरे साथ हूँ जब तक तुझे ज़रूरत है

तुझे ये कैसे बताऊँ कि एतबार करे 


तू मेरे साथ रहा और दो कदम न चला

अजीब फिर भी भरम है कि मुझसे प्यार करे 


भुला चुका हूँ, नहीं है जुबां पे नाम तेरा

ये बात और है, दिल अब भी इंतिज़ार करे 


सफर कठिन है बहुत और दूर है मंज़िल

न जाने कब हो सहर कौन इंतज़ार करे