Saturday, 30 November 2013

दुखड़ा अपना किसको सुनाऊँ

वज़्न - 222  221  122 

दुखड़ा अपना किसको सुनाऊँ
का पहनूँ मै, और का खाऊँ

जब दामों में आग लगी हो
क्या सौदा बाज़ार से लाऊँ

मंहगाई अब मार रही है
कैसे इससे पिंड छुड़ाऊँ

खुद अपना ही बोझ बना मै
कैसे घर का बोझ उठाऊँ

विद्यालय की फीस बहुत है
अब बच्चों को कैसे पढ़ाऊँ

पैसों से हैं, बनते बिगड़ते
रिश्ते ऐसे क्यों मै निभाऊँ

हैं झूठी तारीफ के भूखे
अब इनको मै क्या समझाऊँ 

Sunday, 24 November 2013

हर दफ़ा ख़ुद पर ही निशाना लगता है

वज़्न -  2122  2212   2222

तुम हो तो हर मौसम सुहाना लगता है
हर तरफ जन्नत सा नज़ारा लगता है 

जैसे चाहो आवाज़ दो अपने रब को
प्यार में तो हर नाम अपना लगता है

साथ रहते चलते कई सदियाँ गुज़रीं
क्यों नदी का फिर दो किनारा लगता है

अब दवा असर करती नहीं कोई हम पर 
मर्ज़ जाने कितना पुराना लगता है

अपनी ही परछाई से मै डर जाता हूँ
बाद तेरे सब - कुछ पराया लगता है

 ढूंढनी है अब खामियाँ अपनी नादिर

हर दफ़ा ख़ुद पर ही निशाना लगता है