Saturday, 5 January 2013

विकास बनाम इंसानियत – दर


रोज़ होती रही चर्चायें
बैठकों पे बैठकें
कार्यालयों से लेकर चौपालों तक
कारखानों से लेकर शेयर बाज़ारों तक
हर जगह
कोशिशें जारी हैं 
कैसे बढ़े
कितना बढ़े
कहाँ-कहाँ कितनी गुंजाईशें है
सभी लगे हैं
देश विकसित हो या विकासशील
या कि हो अविकसित
चिंतायें सबकी एक है
कैसे बढ़े विकास-दर
कैसे बढ़े व्यापार
बाज़ार भाव
कैसे बढ़े निर्यात 
फिर चाहे 
मौत का सामान ही क्यों न हो
व्यापार बढ़ना चाहिए
विकास-दर बढ़ती रहनी चाहिए 
और इंसानियत की दर 
घटते - घटते
इतनी घट गई
कि अब
अव्वल तो चर्चा नहीं होती
और जब होती है
तो किसी के पास
वक्त ही नहीं होता 

2 comments:

  1. सार्थक और सही बात है

    recent poem : मायने बदल गऐ

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  2. शुक्रिया रोहितास.

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