Thursday, 12 March 2015

(तरही गज़ल) दिलों के खेल में खुद्दारियाँ नहीं चलतीं

अजब चलन है के अब यारियाँ नहीं चलतीं
नफा न हो तो, वफादारियाँ नहीं चलतीं

नये ज़माने की अय्यारियाँ नहीं चलतीं
हसद की बुग्ज़ की, बीमारियाँ नहीं चलतीं

बिला वजह की तरफदारियाँ नहीं चलतीं
अमल अगर न हो, तैय्यारियाँ नहीं चलतीं

निकल पड़े हैं सफर में ये हौसला लेकर 
कि हौंसला हो तो, दुश्वारियाँ नहीं चलतीं

मज़ा कुछ और है दिल प्यार में लुटाने का 
दिलों के खेल में खुद्दारियाँ नहीं चलतीं

तुम्हें तलाश है जिसकी ख़ुदा अता कर दे 
किसी का छीन के सरदारियाँ नहीं चलतीं


जो असलियत है, नज़र सबको आती है साहब 
ये मुफ़लिसी की अदाकारियाँ नहीं चलतीं।

3 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 5 दिसंबर 2015 को लिंक की जाएगी ....
    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. बहुत सुंदर,,, आप भी पधारें pankajkrsah.blogspot.in

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  3. बहुत सुंदर,,, आप भी पधारें pankajkrsah.blogspot.in

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