Monday, 5 November 2012

दुख (हाईकु)


सूखती नदी
उजड़ते मकान
अपना गाँव

कैसा विकास
लोगों की भेड़ चाल
सुख न शांति

गाँवों में बसा  
नदियों वाला देश
पुरानी बात 

सूखती नदी
बढ़ता गंदा नाला
मेरा शहर 

बिका सम्मान
क्या खेत खलिहान
दुखी किसान 

लोग बेहाल
गिरवी जायदाद
कहाँ ठिकाना 

सड़े अनाज
जनता है लाचार
सोये सरकार 

2 comments:

  1. दृश्य दिखाया
    शहर हो या गाँव
    सब बेहाल ।

    बहुत सुंदर हाइकु .... सच्ची बात कहते हुये

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    1. शुक्रिया संगीता जी

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