Wednesday, 10 October 2012

गिरवी


मैं अपने हाथ
गिरवी रख आया हूँ
चंद सिक्कों के बदले
ख़ुद का
सौदा कर आया हूँ

मैं जानता हूँ
कुछ दिनों तक
पत्नी
नहीं देगी ताने
माँ
कुछ और दिन
जी लेगी
खिलौने बच्चों के लिए
कुछ दिन तक
ख़ुशी का सामान बनेंगे

सब ख़ुश हैं
और मैं
अपने ही हाथों से
लाचार हूँ
अपाहिज हो गया हूँ ।

13 comments:

  1. मर्मस्पर्शी रचना..

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  2. बहुत शुक्रिया रीना जी ।

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  3. सुभानाल्लाह........वाह बहुत ही शानदार ।

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  4. बहुत शुक्रिया ।

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  5. कभी कभी ज़मीर कितना मजबूर हो जाता है ...नादिर जी बहत ही दर्द भरा है इन शब्दों में ....और दुःख तो इस बात का है की यह हक़ीकत है

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  6. ओह ... कितना लाचार होता है आदमी ...

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  7. बहुत शुक्रिया सरस जी और संगीता जी
    दो अशआर आप दोनों को नज्र

    माँ-बाप का साथ किसे अच्छा नहीं लगता
    मेरी मजबूरियों से खुदा बचाना मुझको

    वो शिफत जो अपनों से दूर कर दे
    तू ख्वाहिशों से ऐसी बचाना मुझको

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  8. बेहद सुन्दर रचना

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    1. शुक्रिया ओंकार जी

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  9. बेहद मर्मस्पर्शी रचना .....

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    1. बहुत शुक्रिया उपासना जी

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  10. बहुत अद्भुत अहसास...सुन्दर प्रस्तुति .पोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..........बहुत खूब,बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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  11. ब्लॉग पर आने के लिए बहुत शुक्रिया मदन मोहन जी
    आपने अपने विचारों से सराबोर कर दिया ।
    बहुत आभर

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